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शायद अब महंगाई डायन नहीं- तेल महंगा, मकान महंगा और अब कपडे भी महंगे

(धीरज चतुर्वेदी)

रोटी-कपड़ा और मकान। एक आम इंसान की यहीं जरूरत है और रहेगी। यहीं दुःखती रग है, आम इंसान की। राशन महंगा, खाने का तेल महंगा, चलने के लिये पेट्रोल डीजल महंगा, मकान निर्माण की सामग्री महंगी यानि रोटी और मकान महंगा तो केवल कपड़ा बचा। अब टेक्स की मार में यह भी महंगा हों जायेगा। विकास की झूठी गाथा में आमजन केवल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टेक्स में अपनी जेब ढीली करता जा रहा है। सरकार जिन हाई वे को अपनी उपलब्धि की गाथा बताती है, उस पर भी चलने का टेक्स है। जो ठेकेदारों की जेब में जा रहा है। जब वाहन खरीदते हों तो रोड टेक्स और अब उसी रोड पर चलने का भी टेक्स। बस यहीं है टेक्स की असली गाथा जो विज्ञापनो में विकास का अध्याय है।कोरोना काल में स्वास्थ सुविधाओं की बेहतरी के लिये पेट्रोलियम पर सेस निर्धारित कर दिया गया। हकीकत में यह स्वास्थ्य सुविधाएं कहाँ गई थी, जब कोरोना में मौत के आंकड़ों के कारण शमशान घाट में जगह नहीं थी। खाद्य सामग्री महंगी और मकान बनाने के सपने अधूरे जब खाने के लाले पढ़े हों और अब कपड़ा पर 12 प्रतिशत जीएसटी। देश भर में कपड़ा व्यवसायी विरोध में है पर टेक्स वसूली सरकार को आम जनता की पीढ़ा से कोई सरोकार नज़र नहीं आता। रोटी यानि पेट भर भोजन पर महंगाई की मार,, कपड़ा पर टेक्स की मार और मकान के सपने अधूरे। यानि रोटी, कपड़ा और मकान पर टेक्स की मार से आमजन कहरा रहा है।

अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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